हरेला का संदेश,समलौण का संकल्प-पौधारोपण से प्रकृति संरक्षण की अनूठी पहल

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Siv arora
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हरेला का संदेश,समलौण का संकल्प-पौधारोपण से प्रकृति संरक्षण की अनूठी पहल

 

पौड़ी/श्रीनगर गढ़वाल। हरेला केवल एक पर्व नहीं,बल्कि प्रकृति,संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का जीवंत संकल्प है। उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए जनपद पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड पाबों की पट्टी बाली कण्डारस्यूं स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय सैंजी एवं आंगनबाड़ी केंद्र परिसर में हरेला पखवाड़े के अंतर्गत समलौण पौधारोपण अभियान आयोजित किया गया। इस दौरान माल्टे का समलौण पौधा रोपकर पर्यावरण संरक्षण,हरित भविष्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रेरक संदेश दिया गया। कार्यक्रम में विद्यालय के संस्थापक सुरेश चंद्र,शिक्षक झेल सिंह तथा आंगनबाड़ी कार्यकर्ती रेखा देवी ने संयुक्त रूप से माल्टे का पौधा रोपित किया। पौधे के संरक्षण एवं नियमित देखभाल की जिम्मेदारी आंगनबाड़ी कार्यकत्री रेखा देवी ने स्वयं ग्रहण करते हुए इसे हराभरा बनाए रखने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का संचालन समलौण सेना की नायिका गीता देवी ने किया। उन्होंने कहा कि हरेला पर्व उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान के साथ प्रकृति के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है। समलौण अभियान का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं,बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में पर्यावरण संरक्षण का संस्कार विकसित करना है। उन्होंने छात्र-छात्राओं से अपने जन्मदिन,पारिवारिक उत्सव और अन्य शुभ अवसरों पर एक पौधा अवश्य लगाने तथा उसकी देखभाल करने का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक परिवार प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा रोपकर उसका संरक्षण करे तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की हरियाली और जैव विविधता और अधिक समृद्ध होगी। प्रकृति का संरक्षण ही भविष्य की सबसे बड़ी सामाजिक और सांस्कृतिक सेवा है। इस अवसर पर पुष्पा देवी,अनीता देवी,आरती देवी,मोनिका देवी सहित समलौण सेना की सदस्याएं,विद्यालय के छात्र-छात्राएं एवं स्थानीय ग्रामीण उपस्थित रहे। सभी ने पौधारोपण के साथ पर्यावरण संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया और अधिक से अधिक लोगों को इस अभियान से जोड़ने का आह्वान किया। हरेला पखवाड़े के अंतर्गत आयोजित यह कार्यक्रम केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं रहा,बल्कि प्रकृति,संस्कृति और समाज के बीच अटूट संबंध को सुदृढ़ करने का प्रेरणादायी प्रयास भी बना। उत्तराखंड की लोक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण की भावना को आगे बढ़ाने वाली ऐसी पहलें निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित और समृद्ध भविष्य की मजबूत नींव साबित होंगी।

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