2013 की बाढ़ के 13 साल बाद भी अधूरी सुरक्षा दीवार-अलकनंदा के किनारे फिर मंडरा रहा खतरा,सितंबर अंत से आंदोलन की चेतावनी

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Siv arora
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2013 की बाढ़ के 13 साल बाद भी अधूरी सुरक्षा दीवार-अलकनंदा के किनारे फिर मंडरा रहा खतरा,सितंबर अंत से आंदोलन की चेतावनी

श्रीनगर गढ़वाल। वर्ष 2013 की भीषण बाढ़ की त्रासदी के बाद अलकनंदा नदी के तटवर्ती क्षेत्रों को बाढ़ और कटाव से बचाने के लिए शुरू किया गया सुरक्षा दीवार निर्माण कार्य वर्षों बाद भी अधूरा पड़ा है। श्रीनगर नगर क्षेत्र में पीपलचौरी से श्रीकोट तक प्रस्तावित सुरक्षा दीवार का निर्माण आज भी पूरा नहीं हो पाया है। स्थानीय लोगों ने अधूरी सुरक्षा दीवार का निर्माण शीघ्र पूरा करने के साथ ही दीवार के पीछे मिट्टी एवं बोल्डर का भरान कर तट को मजबूत करने की मांग उठाई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2013 में अलकनंदा नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने श्रीनगर क्षेत्र में भारी तबाही मचाई थी। केशवराव मठ,एसएसबी क्षेत्र,भक्तियाणा सहित नदी किनारे के कई इलाकों में बाढ़ और कटाव का गंभीर प्रभाव देखने को मिला था। उस समय भविष्य में ऐसी आपदा से बचाव के लिए अलकनंदा नदी तट पर सुरक्षा दीवार निर्माण की योजना पर काम शुरू किया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार तत्कालीन समय में पीपलचौरी से श्रीकोट तक अलकनंदा नदी के किनारे सुरक्षा दीवार का निर्माण कार्य शुरू किया गया था। निर्माण कार्य का एक हिस्सा पीपलचौरी से केशवराव मठ के समीप तक पूरा भी कर दिया गया,लेकिन इसके आगे सुरक्षा दीवार का निर्माण कार्य वर्षों से अधर में लटका हुआ है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि अधूरी दीवार के कारण नदी के किनारे कई स्थान आज भी बाढ़ एवं कटाव की दृष्टि से संवेदनशील बने हुए हैं। लोगों का कहना है कि केवल दीवार खड़ी कर देने से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी,बल्कि उसके पीछे मिट्टी और बड़े पत्थरों का भरान कर तट को मजबूती देना भी आवश्यक है। आश्वासन बहुत मिले,धरातल पर काम का इंतजार अधूरी सुरक्षा दीवार को लेकर स्थानीय नागरिकों ने समय-समय पर शासन-प्रशासन का ध्यान आकृष्ट किया। श्रीनगर बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले धरना-प्रदर्शन तक किए गए,लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें हर बार आश्वासन ही मिला और सुरक्षा दीवार का शेष निर्माण आज तक पूरा नहीं हो पाया। लोगों का कहना है कि अलकनंदा जैसी पहाड़ी नदी के तट पर सुरक्षा व्यवस्था को किसी राजनीतिक दल या सरकार के कार्यकाल से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह सीधे तौर पर श्रीनगर शहर और नदी किनारे रहने वाले लोगों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। कांग्रेस प्रदेश सचिव वीरेंद्र सिंह नेगी,कांग्रेस मीडिया प्रभारी लाल सिंह नेगी तथा नगर निगम श्रीनगर के कमलेश्वर बागवान वार्ड के पार्षद सूरज नेगी ने कहा कि वर्ष 2013 की बाढ़ ने श्रीनगर को गहरा जख्म दिया था। अलकनंदा का जलस्तर बढ़ने के बाद नदी किनारे के कई क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ था। उन्होंने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर सुरक्षा दीवार निर्माण की दिशा में पहल की थी। लेकिन सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने कहा कि इसके बाद प्रदेश में कई सरकारें आईं और गईं,लेकिन श्रीनगर की सुरक्षा से जुड़ी यह महत्वपूर्ण योजना आज भी अधूरी पड़ी है। स्थानीय लोगों ने कहा कि सुरक्षा दीवार के शेष निर्माण के साथ-साथ दीवार के पीछे पर्याप्त मात्रा में मिट्टी एवं बोल्डर का भरान किया जाना भी जरूरी है। उनका कहना है कि यदि तट को भीतर से मजबूती नहीं दी गई तो भविष्य में तेज बहाव और कटाव के दौरान सुरक्षा दीवार पर दबाव बढ़ सकता है।

लोगों ने शासन-प्रशासन से मांग की कि नदी तट का तकनीकी निरीक्षण कराकर संवेदनशील स्थानों को चिन्हित किया जाए तथा अधूरी सुरक्षा दीवार को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में अलकनंदा का जलस्तर बढ़ने के साथ ही नदी का बहाव और कटाव भी तेज हो जाता है। ऐसे में अधूरी सुरक्षा दीवार को लेकर लोगों की चिंता स्वाभाविक है। उनका कहना है कि किसी नई आपदा का इंतजार करने के बजाय पूर्व में सामने आए खतरे से सबक लेते हुए समय रहते स्थायी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। स्थानीय नागरिकों ने सरकार और शासन-प्रशासन को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अधूरी सुरक्षा दीवार के निर्माण को शीघ्र शुरू करने के लिए ठोस कार्रवाई नहीं की गई तो सितंबर माह के अंतिम सप्ताह से आंदोलन शुरू किया जाएगा। लोगों ने कहा कि उनकी मांग किसी राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित नहीं,बल्कि श्रीनगर शहर और नदी तटवर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा से जुड़ी है। उन्होंने शासन से मांग की कि मामले को गंभीरता से लेते हुए निर्माण कार्य की समयबद्ध शुरुआत कराई जाए और इसकी निगरानी के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनाई जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि 2013 जैसी भयावह त्रासदी को दोहराने से रोकना सरकार और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसलिए अधूरी सुरक्षा दीवार अब केवल एक निर्माणाधीन परियोजना नहीं,बल्कि श्रीनगर की सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन चुकी है।

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