डिजिटल दौर में लोकसंस्कृति की नई उड़ान-एक मंच पर गूंजेगी उत्तराखंड की लोकधुन और पॉप कल्चर की आवाज

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Siv arora
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डिजिटल दौर में लोकसंस्कृति की नई उड़ान-एक मंच पर गूंजेगी उत्तराखंड की लोकधुन और पॉप कल्चर की आवाज

श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति,लोकसाहित्य,लोकभाषा और लोकसंगीत को डिजिटल युग में नई पहचान और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की संभावनाओं पर देशभर के विद्वान,लोक कलाकार और संस्कृतिकर्मी एक मंच पर जुटेंगे। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर स्थित हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली के तत्वावधान में 7 एवं 8 सितम्बर 2026 को डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति और पॉप कल्चर विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन महज एक अकादमिक संगोष्ठी तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि उत्तराखंड की लोक परंपरा के जीवंत संवाहकों और अकादमिक जगत के बीच संवाद का महत्वपूर्ण सेतु बनने जा रहा है। बदलते डिजिटल दौर में लोकसंस्कृति के प्रस्तुतीकरण,संरक्षण,प्रसार और उपभोग के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जहां लोककला और लोकसंगीत को दुनिया तक पहुंचाने के नए रास्ते खोले हैं,वहीं पारंपरिक स्वरूप,मौलिकता और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने की चुनौती भी सामने आई है। संगोष्ठी में इन्हीं महत्वपूर्ण पहलुओं पर गंभीर विमर्श होगा। राष्ट्रीय संगोष्ठी का सबसे बड़ा आकर्षण उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के स्थापित हस्ताक्षरों और डिजिटल माध्यमों के जरिए नई पहचान बना रहे कलाकारों का एक मंच पर आना होगा। गढ़रत्न लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी,जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण तथा प्रसिद्ध लोकगायिका अनुराधा निराला सहित अनेक प्रतिष्ठित लोक कलाकार अपनी कला-साधना और अनुभवों के माध्यम से लोक-संस्कृति के वर्तमान स्वरूप और भविष्य की संभावनाओं पर विचार रखेंगे। वहीं डिजिटल माध्यमों के जरिए उत्तराखंड के लोकसंगीत और पहाड़ी संस्कृति को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाने वाले दर्शन फर्स्वाण,अमित सागर और अंजलि खरे पॉपुलर कल्चर के बदलते स्वरूप,डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका और लोकसंगीत के नए दर्शक वर्ग पर अपने अनुभव साझा करेंगे। लोकसंगीत को आधुनिक संगीत संयोजन के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयासों के लिए चर्चित पंचतत्व बैंड के माध्यम से ठेठ पहाड़ी गीतों को नए रूप में प्रस्तुत करने वाले अभिषेक नौटियाल एवं अरविन्द चौहान भी संगोष्ठी में अपनी बात रखेंगे। वहीं पहाड़ी होली गीतों को नई साज-सज्जा और रचनात्मक प्रयोगों के माध्यम से प्रस्तुत कर पहाड़ी अस्मिता और सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत रखने में सक्रिय सचिन पुसोला लोक-संस्कृति और पॉपुलर कल्चर के समकालीन संदर्भों पर विचार साझा करेंगे। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केन्द्र चौरास परिसर में आयोजित होने वाली संगोष्ठी के संयोजक हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ.कपिल देव पंवार ने बताया कि राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए पिछले दो माह से देशभर के विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों,शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों से शोधपत्र आमंत्रित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी का उद्देश्य डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति,लोकभाषाओं,लोककलाओं,लोकसंगीत,लोकसाहित्य और पॉप कल्चर के बीच विकसित हो रहे अंतर्संबंधों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को आगे बढ़ाना है। डॉ.पंवार ने कहा कि लोक कलाकारों और अकादमिक जगत को एक मंच पर लाने का प्रयास इसलिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि लोकसंस्कृति केवल किताबों में अध्ययन की विषयवस्तु नहीं है। यह उन कलाकारों,लोकगायकों और संस्कृतिकर्मियों की जीवंत साधना है,जो पीढ़ियों से अपनी कला और परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं। डिजिटल माध्यमों ने इन परंपराओं को नई पीढ़ी और वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने के अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। ऐसे में इन अवसरों और चुनौतियों को समझना तथा लोक परंपराओं को दस्तावेजीकृत करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग की अध्यक्ष प्रो.मंजुला राणा ने कहा कि संगोष्ठी में उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण,डिजिटलीकरण,पुनर्प्रस्तुतीकरण और नई पीढ़ी तक उसके प्रभावी संप्रेषण के साथ-साथ पॉपुलर कल्चर में लोक तत्वों की उपस्थिति पर विशेष चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि आज डिजिटल माध्यम लोक-संस्कृति को गांव की चौपाल और स्थानीय मंच से निकालकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि डिजिटल लोकप्रियता के बीच लोक-संस्कृति की मौलिकता और सांस्कृतिक पहचान को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए। देशभर से जुटेंगे विद्वान और शोधार्थी राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षाविद एवं वरिष्ठ पत्रकार तथा उत्तराखंड सरकार की मीडिया सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रो.गोविन्द सिंह,कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं वरिष्ठ लोकसाहित्यकार प्रो.देव सिंह पोखरिया,बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो.गुरुप्रसाद सिंह समेत अनेक प्रतिष्ठित विद्वान,शिक्षक,शोधार्थी और विषय विशेषज्ञ सहभागिता करेंगे। आयोजन में देशभर से शिक्षकों,शोधार्थियों,विद्यार्थियों,कलाकारों और संस्कृति कर्मियों की सहभागिता से उत्तराखंड की लोक-संस्कृति पर व्यापक राष्ट्रीय संवाद को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह राष्ट्रीय संगोष्ठी उस दौर में आयोजित हो रही है,जब पहाड़ की लोकधुनें गांव की चौपाल से निकलकर डिजिटल मंचों पर पूरी दुनिया तक पहुंच रही हैं। ऐसे समय में परंपरा और तकनीक के इस मिलन पर गंभीर मंथन न केवल उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है,बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का एक नया रास्ता भी तैयार कर सकता है।

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